कर्म क्या है जैन धर्म के अनुसार

Karma 11 views Asked 24 August, 2025

Quick Answer

जैन धर्म के अनुसार कर्म आत्मा पर चिपकने वाली सूक्ष्म पदार्थों की एक प्रकार की बंधन है, जो जीव के पुनर्जन्म और दुखों का कारण बनती है।

Detailed Answer

जैन धर्म में कर्म को आत्मा के साथ चिपकने वाले सूक्ष्म पदार्थ के रूप में समझा जाता है, जो जीव के शुद्ध स्वरूप को ढक देता है। यह पदार्थ जीव के कर्मों के अनुसार विभिन्न प्रकार के होते हैं और आत्मा के बंधन का कारण बनते हैं। कर्म के कारण आत्मा जन्म-मरण के चक्र में फंसी रहती है और दुखों का अनुभव करती है। जैन दर्शन में कर्म का मुख्य उद्देश्य आत्मा को इन बंधनों से मुक्त कर मोक्ष प्राप्त करना है।

कर्म के विभिन्न प्रकार होते हैं, जैसे ज्ञानवर्धक, दर्शनवर्धक, और व्यवहारवर्धक कर्म, जो जीव के जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करते हैं। जैन धर्म में कर्म के सिद्धांत के अनुसार, जीव के अच्छे या बुरे कर्म उसके अगले जन्म और जीवन की परिस्थितियों को निर्धारित करते हैं। इसलिए, कर्मों के बंधन से मुक्ति के लिए अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, और तप जैसे नियमों का पालन आवश्यक माना गया है।

इस प्रकार, जैन धर्म में कर्म केवल नैतिक या आध्यात्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक भौतिक और सूक्ष्म पदार्थ है जो आत्मा के साथ जुड़कर उसके दुखों और पुनर्जन्म का कारण बनता है। आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए कर्मों का नाश आवश्यक है।

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